34 साल बाद भी राजनीतिक दलों के लिए भोपाल गैस कांड चुनावी मुद्दा क्यों नहीं

भोपाल गैस कांड ,(स्टिंग ऑपरेशन)  दिसंबर 2, 2018 को भोपाल गैस कांड को 34 वर्ष पूरे हो जाएंगे. यह विश्व की एक ऐसी औद्योगिक त्रासदी है जहां हजारों लोगों की जान गई है, लाखों लोग पीड़ित हुए हैं, पीड़ितों की पीढ़ियां उस गैस के अनुवांशिक प्रभावों को अब तक झेल रही हैं, जो उस त्रासदी में जीवित बचे या तो विकलांग होकर जी रहे हैं या फिर रोज नई बीमारियों से दर्द का घूंट पी रहे हैं, नई पीढ़ियां भी विकलांग पैदा हो रही हैं, लेकिन तीन दशक से अधिक समय बीतने के बाद भी पीड़ितों को पर्याप्त मुआवजा नहीं मिला है.जहां सरकारें आज किसी घटना में किसी नागरिक की मौत पर गाहे-बगाहे करोड़ों के मुआवजे की घोषणा कर देती हैं. वहीं, 34 सालों से मिथाइल आइसोसाइनाड (एमआईसी) का प्रकोप झेल रही भोपाल गैस कांड की पीड़ित जनता को केवल 50 हजार रुपये का ही अब तक मुआवजा मिला है.पीड़ितों के इलाज के लिए सरकारी अस्पताल बनाए तो गए लेकिन वहां इलाज करने डॉक्टर ही नहीं हैं. गैस कांड की जिम्मेदार रसायन कंपनी यूनियन कार्बाइड का रासायनिक कचरा फैक्ट्री परिसर में पड़ा है जो जमीन के रास्ते भूजल में मिलकर जमीन के अंदर जहर घोल रहा है.42 बस्तियां इसकी चपेट में आ गई हैं. लाखों जीवन खतरे में हैं और भूजल की वह नदी अंदर ही अंदर अपना दायरा बढ़ाती जा रही है. पहले ऐसी 22 बस्तियां थीं जहां का भूजल जहरीला था, लेकिन पिछले दिनों आई इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च (आईआईटीआर) की रिपोर्ट में 15 बस्तियां और जुड़ गई हैं.अगर ऐसा ही रही तो आगे यह संख्या और बढ़ेगी, 50 होगी, फिर 100 भी होगी. इस सबके बावजूद लाखों लोगों की जिंदगी दांव पर लगी है फिर भी यह कांग्रेस, भाजपा और अन्य सभी राजनीतिक दलों के लिए चुनावी मुद्दा नहीं है.

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